क्या रील और रियल के बीच जो सच है, वो समझ आ सकता
भूख से तड़प रहे लोगों के सामने अचानक 56 भोग रख दें तो उनके अंदर धँसते पेट, बाहर निकलते फेफड़े दिखने बंद नहीं होते | भूखों के सामने एक साथ कई सारे पकवान परोसे जाएंगे तो वो उल्टी कर देगा या कंफ्यूज़ हो जाएगा | ख़ासतौर पर तब जब ये भूख भी खाना परोसने वाले ने ही पैदा की हो | 'सेक्रेड गेम्स-2' की कहानी भी कुछ ऐसी ही है | स्कूल जाने वाले बच्चे के बस्ते में विज्ञान, नैतिक शिक्षा, पुराण, मनुस्मृति, जेनोसाइड, वर्महोल, 'गॉड इज डेड' वाले दार्शनिक फेडरिक नीत्शे और ओशो की 'संभोग से समाधि' किताब रख दी गई है | इस स्कूल जाने वाले बच्चे को गणेश गायतोंडे (नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी) की समझाई भदेस बात तो पसंद आती है | लेकिन गुरुजी (पंकज त्रिपाठी) के ज़रिए निहिलिज्म, अमीबा, अणु, न्यूक्लियर एनर्जी और समय चक्र समझाने की कोशिश दार्शनिकता का 'दूर-दर्शन' जान पड़ती है | इन सबके बीच ठहरने की चाह में ये स्कूली बच्चा सरताज (सैफ़ अली ख़ान) की तरह भागता रहता है | ये सब एक बार में समझने की उम्मीद उस पब्लिक से की गई है, जो रियल में भी बिना डिस्कलेमर वाले रील देखने की आदी है | उन्नाव केस, मॉब लिंचिंग, गोरक्षा, बलात्कार, लव जिहाद, नो वन किल्ड पहलू ख़ान, देशभक्ति, सेक्युलर- एक गाली? सब अपना क़िस्सा लेकर आए हैं | अपुन का काम है, उसको जोड़ना | पहले सीज़न की ताक़त रहा ये डायलॉग दूसरे सीज़न की कमी जान पड़ता है | लेकिन क्या ये वाक़ई कमी है? सेक्रेड गेम्स-2 शायद उम्मीदों का शिकार है | ये उम्मीदें दोतरफ़ा हैं | सेक्रेड गेम्स बनाने वालों की भी और देखने वालों की भी | बनाने वालों ने शायद सोचा कि पहले सीज़न में 'अतापि-वतापि' का कॉन्सेप्ट समझ चुके लोग नेक्स्ट लेवल के लिए तैयार हैं | देखने वालों को लगा कि सारे कॉन्सेप्ट समझना 'कुकू का जादू' नहीं है कि सब पर चल जाए | लेकिन अगर इस 'जादू' को एक छड़ी में बांधकर चलाया जाए तो क्या रील और रियल के बीच जो सच है, वो समझ आ सकता है? आइए आप और 'अपुन' कोशिश करते हैं | लेकिन क्या आप क्या रील और रियल के बीच जो सच जानना चाहते है कमेंट में हमें बताये उसके बाद आप के लिए ये सच लेकर आएंगे हम......

