मैं हूँ बहता चला
मैं हूँ बहता चला समीर की तरह,
ऊँची बुलंदियों को छूता हुआ।
बिना रुके बिना थके, बिना किसी से कुछ कहे,
अपनी राह को बुनता हुआ।
मैं हूँ बहता चला.....
घने अँधेरो को चीरता हुआ,
कई ज़िन्दगी को रौशनी देता हुआ।
न जाने कितने आँधी तूफानो को, चट्टानों की तरह रोकता हुआ,
मैं हूँ बहता चला समीर की तरह।
कई अनसुलझे सवालो के जवाबो को ढूँढ़ता हुआ,
ज़िन्दगी की सच्चाइयों को समझता हुआ।
बड़ी ख़ामोशी से हर किसी की ख़ामोशी को भाँपता हुआ,
बिन कहे सबको सुनता हुआ।
मैं हूँ बहता चला.....
हर किसी को एक नयी राह दिखाता हुआ,
लोगो को जीने का तरीका सिखाता हुआ
मैं हूँ बहता चला.....
अपने अंदर एक राग बनाता हुआ,
अंदर की ख़ामोशी को सुरो में पिरोता हुआ।
अनकहे शब्दों को गुनगुनाता हुआ,
हर लम्हा खास बनाता हुआ ,
मैं हूँ बहता चला....
कितनी रातों को जाग कर एक सपना सच करता हुआ,
सबका प्यार और विश्वास समेटता हुआ।
चंद लोगो के साथ आशाओं का दीपक जलाता हुआ ,
अपने पीछे एक इतिहास रचता हुआ ।
मैं हूँ बहता चला.....
ज़िन्दगी की पगडंडियों पर कुछ सबक लेता हुआ,
और कुछ सबक देता हुआ।
मैं हूँ बहता चला......
----(प्रज्ञा शुक्ला)----






















