चंद भावपूर्ण पंक्तियाँ.......!
बेमतलब की ख्वाहिशों को विराम लगाओ ज़रा,
स्वार्थी न बनो, दूसरों के लिए भी मुस्कुराओ ज़रा,
खुशियों में तो सब ही अपने नज़र आते हैं,
अगर हिम्मत है तो किसी के दुःख में भी,
हमदर्द बनकर खड़े नज़र आओ ज़रा।
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मन न हो तू उदास, बुरे वक्त की नज़ाकत पर;
बड़े-बड़े धराशायी हो जाते हैं, बदलते वक्त की ताकत पर
बस रख तू हौंसला और एक दिन खुश होगा तू,
अपनी कोशिश करने की आदत पर।
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कभी-कभी हताशा के दौर भी आते हैं जीवन में,
तभी हमें अपनी सहनशक्ति का अंदाजा होता हैं।
खुशियों की घड़ियों में जितनी भीड़ दिखती है,
मुसीबतों में वही हुजूम आधा होता है।
पर जिनका मजबूत इरादा होता है,
उनका मंजिल पाने का अवसर भी उतना ही ज्यादा होता है।
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बस खुद को आगे बढ़ाने की इच्छा है,
न कि किसी को गिराने की तमन्ना;
सच के लिए तो हम मिटा दे खुद को भी,
पर गलत के लिए क्यों खुद को बदलना?
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जब हताशा के काले बादल छाने लगते हैं,
तो हम और भी ज्यादा मुस्कुराने लगते हैं;
अंदर से दुखी भी हो तो क्या फर्क पड़ता हैं?
कम से कम हताशा फैलाने वाले तो घबराने लगते हैं।
हम तो जीते हैं इस सिद्धातं पर,
की दुःख और निराशा हैं तो रात है, और
रात के बाद दिन आने का नियम बनाया है कुदरत ने,
इसीलिए हम ख़ुशीरुपी दिन के अरमाँ सजाने लगते हैं।
दुःख का असली कारण ज्यादा उम्मीदें है किसी से,
इसीलिए उम्मीदों के बिना ही कोई रिश्तें बनाइये,
क्योंकि जब ये उम्मीदों के घरौंदे टूट जाने लगते हैं,
तो अपने आप ही मोह-माया के सब बंधन छूट जाने लगते हैं।
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न अनाड़ी तू बन, न खिलाड़ी तू बन,
अपनी अच्छाईयों से जो जीत ले दिलों को,
बस ऐसा ही एक ज़ुआरी तू बन।
जिस पर विश्वास करना चाहे सब हरदम,
और जिससे बात करने पर दिखे अपने जैसा ही मन,
बस बन जा तू वही उजला दर्पण।
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ज्यादा ज़ज्बाती होने के भी बहुत नुकसान हैं,
सच और मज़ाक में मुश्किल होती पहचान है;
खुद के दुःख से ज्यादा दुःख होता नहीं अब,
दुःख तो तब होता है जब लगे कि
हमारी वजह से कोई शख्स परेशान हैं।
हम तो खुशियाँ बाँटना चाहते हैं,
सूरज की रोशनी की तरह,
पर सबको खुश रखना कहाँ आसान हैं?
किसी को उसमे तेज़ उजाला दिखता है,
तो किसी को तेज धूप से इंकार है।
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मैं सबकी सुन लेती हूँ,
पर दिल पर कभी नहीं लेती हूँ;
मैं तो कल-कल सी करती सरिता हूँ,
जो अपने धुन में ही बहती हूँ।
क्यों जानू मैं दुनिया को,
जब अभी खुद को जानना ही बाकी है;
इसलिये जब भी मन कर जाता है,
खुद के बारे में ही लिख लेती हूँ।
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आसान नहीं होता अपने माँ-बाबा का घर छोड़ना,
बहुत मुश्किल होता है वर्षों के बन्धन से मुँह मोड़ना;
ये सहनशक्ति केवल नारियों ने ही पायी है,
एक पल में ही बन जाती अपने साजन की परछाई है।
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कुछ खास नहीं है ज़िन्दगी, पर पास तो है;
कुछ 'अपने से' हैं दूर ही सही,
पर वो साथ हैं दिल से, ये एहसास तो है।
उनसे ज्यादा की चाहत नहीं करते हैं हम,
इतना ही काफी है कि उनके मन में भी-
अपनेपन वाले कुछ ज़ज्बात तो हैं।
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नासमझ हैं वो लोग,
जो हमें नज़रअंदाज करते हैं;
हमें दिल से जानने वाले तो,
हम पर नाज़ करते हैं।
क्यों ऐसे लोगो के लिए भी,
ये दिल पसीज जाता हैं बार-बार?
जो हमें बरबाद करके,
खुद को आबाद करते हैं।
हमारी खुशियाँ अक्सर-
जिनसे देखी नहीं जाती,
क्यों हमारे लब उनके लिये भी,
सकुशलता की फरियाद करते हैं?
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