भांंग नशा नहीं, प्रसाद
बाबा विश्वनाथ की पूजा अर्चना के साथ ही भक्त बाबा का प्रसाद भांग जरूर खाते हैं | दरअसल, शिवरात्रि के दिन जब पूरा बनारस बाबा का बाराती होता है, तो उनके सिर पर चढ़ी भांग की मस्ती पर्व के रंग को और गाढ़ा कर देती है | जाहिर है कि जब बाबा के सभी भक्त भांग खाते हैं, तो इतने भक्तों को भांग उपलब्ध कराने की तैयारी भी बड़े पैमाने पर की जाती होगी | बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी में सरकारी भांग की दुकान में हर वक्त भीड़ देखने को मिलती है | वहीं शिवरात्रि के पर्व के मौके पर तो इन दुकानों में कुछ ज्यादा ही हलचल देखने को मिलती है | काशी में इस दौरान भांग की खपत ज्यादा होती है और इसलिए दुकानदार भांग को हाथों से नहीं, बल्कि मशीनों से पीसते हैं |
बनारस के लिए भांग नशा नहीं प्रसाद है, इसलिए इसे बनाते समय साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखा जाता है | भांग वाली ठंडई की भी यहां भारी डिमांड होती बनारस में कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो बारहों महीने भांग खाते हैं, लेकिन शिवरात्रि के अवसर पर इसे खास तौर पर लगभग सभी लोग खाते हैं | कोई इसे कुल्फी में भरकर खाता है तो कोई इसका बिस्कुट या फिर बर्फी में खाता है | भांग को शास्त्रों में विजया के नाम से भी संबोधित किया जाता है | मान्यता के अनुसार भगवान भोले नाथ को भांग, धतूरा, पान और ताम्बुल प्रसाद के रूप चढ़ाया जाता है | इसी मान्यता के आधार पर वाराणसी में आम लोग इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं | वहीं इसके औषधीय गुण भी हैं | भांग को अगर सीमित मात्रा में लिया जाय तो ये आयुर्वेदिक दवा है | प्राचीन काल में इसका इस्तेमाल ध्यान लगाने के लिए भी किया जाता था | हालांकि ये भी सच है कि अधिक मात्रा में इसके सेवन से नुकसान पहुंचता है |

