मिशन चंद्रयान 2: इसरो के लिए आज खास दिन
चंद्रयान 2 भारतीय चंद्र मिशन है जो पूरी हिम्मत से चाँद के दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र में उतरेगा जहां अभी तक कोई देश नहीं पहुंचा है - यानी कि चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र। इसका मकसद, चंद्रमा के प्रति जानकारी जुटाना और ऐसी खोज करना जिनसे भारत के साथ ही पूरी मानवता को फायदा होगा। इसरो ने चंद्रयान-2 के ऑर्बिटर से ‘विक्रम' लैंडर को सफलतापूर्वक अलग किया है। इसरो ने रविवार को कहा था कि उसने चंद्रयान-2 को चंद्रमा की पांचवीं एवं अंतिम कक्षा में सफलतापूर्वक प्रवेश कर लिया।
रविवार को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने इस प्रक्रिया (मैनुवर) के पूरा होने के बाद कहा कि अंतरिक्ष यान की सभी गतिविधियां सामान्य हैं। इसके बाद करीब 20 घंटे तक विक्रम लैंडर ऑर्बिटर के पीछे-पीछे 2 किमी प्रति सेकंड की गति से ही चक्कर लगाता रहेगा। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के वैज्ञानिक के लिए यह बड़ी सफलता है और अब उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती प्रज्ञान रोवर की चांद पर सॉफ्ट लैंडिंग कराना है। बता दें कि जो विक्रम लैंडर आज सफलतापूर्वक चंद्रयान से अलग हुआ है उसका नाम इसरो के संस्थापक और भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक विक्रम साराभाई के नाम पर रखा गया है। 7 सितंबर का दिन चंद्रयान मिशन 2 के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण होगा क्योंकि उसी दिन विक्रम लैंडर चांद पर उतरेगा। 7 सितंबर की रात 1:30 बजे रात तक विक्रम लैंडर 35 किमी की ऊंचाई से चांद के दक्षिणी ध्रुव पर उतरना शुरू करेगा। तब इसकी गति होगी 200 मीटर प्रति सेकंड. यह इसरो वैज्ञानिकों के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण काम होगा।
चंद्रयान 2 के वैज्ञानिक उद्देश्य क्या हैं
चंद्रमा हमें पृथ्वी के क्रमिक विकास और सौर मंडल के पर्यावरण की अविश्वसनीय जानकारियां दे सकता है। वैसे तो कुछ परिपक्व मॉडल मौजूद हैं, लेकिन चंद्रमा की उत्पत्ति के बारे में और अधिक स्पष्टीकरण की आवश्यकता है। चंद्रमा की सतह को व्यापक बनाकर इसकी संरचना में बदलाव का अध्ययन करने में मदद मिलेगी। चंद्रमा की उत्पत्ति और विकास के बारे में भी कई महत्वपूर्ण सूचनाएं जुटाई जा सकेंगी। वहां पानी होने के सबूत तो चंद्रयान 1 ने खोज लिए थे और यह पता लगाया जा सकेगा कि चांद की सतह और उपसतह के कितने भाग में पानी है।
चंद्रमा के दक्षिण ध्रुव तक पहुंचना क्यों जरूरी
चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव विशेष रूप से दिलचस्प है क्योंकि इसकी सतह का बड़ा हिस्सा उत्तरी ध्रुव की तुलना में अधिक छाया में रहता है। इसके चारों ओर स्थायी रूप से छाया में रहने वाले इन क्षेत्रों में पानी होने की संभावना है। चांद के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र के ठंडे क्रेटर्स (गड्ढों) में प्रारंभिक सौर प्रणाली के लुप्त जीवाश्म रिकॉर्ड मौजूद है। चंद्रयान-2 विक्रम लैंडर और प्रज्ञान रोवर का उपयोग करेगा जो दो गड्ढों- मंज़िनस सी और सिमपेलियस एन के बीच वाले मैदान में लगभग 70° दक्षिणी अक्षांश पर सफलतापूर्वक लैंडिंग का प्रयास करेगा।

