फिरोज गांधी को कोई क्यो याद नही करता
फिरोज जहांगीर गांधी एक पारसी थे, पारसी लोग मूलतः ईरान में पाये जाते थे, जब ईरान में दूसरे अनुयायी का ज्यादा बोलबाला हुआ तो,पारसी लोगो ने भारत मे शरण ली ये लोग गुजरात, बम्बई जो उस समय था और गोवा में आये थे,फिरोज 12 सितम्बर 1912 को बम्बई में पैदा हुये थे, वह राजनेता थे और पत्रकार भी,उनके पिता का नाम जहाँगीर था जो उनके नाम मे जुड़ा, उनकी माता का नाम रातिमाई था और बम्बई के खेतबॉडी मोहल्ले में रहते थे, फिरोज अपने 5 भाई बहन में सबसे छोटे थे उनके दो भाई दोराब और फरीदुन जहांगीर, और दो बहनें, तेहमिना करशश और आलू दस्तुर थी। फ़िरोज़ का परिवार मूल रूप से दक्षिण गुजरात के भरूच का निवासी है, जहां उनका पैतृक गृह अभी भी कोटपारीवाड़ में उपस्थित है।१९२० में अपने पिता की मृत्यु के बाद, फिरोज अपनी मां के साथ इलाहाबाद में उनकी अविवाहित मौसी, शिरिन कमिसारीट के पास रहने चले गए,
इलाहबाद में ही फ़िरोज़ ने विद्या मंदिर हाई स्कूल में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की, और फिर ईविंग क्रिश्चियन कॉलेज से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। 8 सितम्बर 1960 को संसंद में दिल का दौरा पड़ने से निधन हुआ, वो अपने आप से इतना नाराज थे कि दिल का दौरा पड़ने के बाद भी वो स्वयं कार चला कर अस्पताल पहुँचे, इलाहाबाद जो अब प्रयागराज है में उनको दफनाया गया मगर आज ये विवाद है कि वो मज़ार है समाथि स्थल। स्थानीय लोगो का कहना है उनकी कब्र पर मरने के बाद कोई परिबार का सदस्य नही आता, वो अपने अंतिम दिनों में तन्हा थे, पारसी, मुस्लिम, या कोई अन्य सबका वंश पिता से चलता है मगर हिन्दू धर्म ही ऐसा है जहाँ वंश पिता माता दोनों में से किसी एक से चल सकता है –arYa





