भारत के बेटे वीर अब्दुल हमीद की बरसी पर
10-9-2014 5.09pm IST
Medhaj News: भारत की धरती वीरों की धरती है. भाषा जाति धर्म चाहे कोई भी हो लेकिन देश की सीमाओं और देश के स्वाभिमान की रक्षा में शौर्य और बलिदान के मामले में देश के बेटे कभी पीछे नहीं रहे. देश के लिए जान देने वाले वीरों का ऋणी भारत आज १९६५ के पकिस्तान युद्ध में वीर गति को प्राप्त अब्दुल हमीद का शहीद दिवस मना रहा है
१९६५ का भारत पाकिस्तान युद्ध
देश की सेवा और बलिदान में नाम रोशन करने का जब जब मौका मिला वीर अब्दुल हमीद खरे उतरे. १९६५ की लड़ाई में भारतीय सेना को खेमकरन सेक्टर में काफी नुकसान उठाना पड़ा था. अमेरिकी सहयोग से मिले पैटन टैंकों की मदद से पकिस्तान ने खेमकरन सेक्टर के मोर्चे पर जबरदस्त हमला किया. नतीजे में कई जवान मारे गए. हालात की नज़ाकत को देखते हुए वीर अब्दुल हमीद ने बंकर से बाहर निकल के लड़ने का फैसला किया. एक जीप पर आरसीएल गन लोड करके मोर्चा संभाला. अपने शौर्य और सूझ बूझ से एक एक करके तीन पैटन टैंकों को निशाना बना के तबाह कर दिया. चौथी ग्रेनेडियर डिविजन की चौथी बटालियन में तैनात भारत के बहादुर बेटे ने पकिस्तान के छक्के छुडा दिए.
चौथे पैटन टैंक को निशाना बनाते हुए दुश्मन की ओर से हुए अब्दुल हमीद एक हमले में शहीद हो गए.
वीर अब्दुल हमीद ने अमेरिकी बैसाखी पर खड़े पाकिस्तानी अभिमान के साथ साथ अमेरिकी हथियारों के सौदागरों की कारस्तानी पर भी सवाल खड़े कर दिए.
सेवा और वीरता पुरस्कार
वीर अब्दुल हमीद ने भारतीय थल सेना की ग्रेनेडियर डिवीजन का नाम स्वर्णाक्षरों में लिखवा दिया. मरणोपरांत शहीद को सैन्य सेवा मैडल, समर सेवा मैडल और देश के सर्वोच्च शहीद सम्मान परमवीर चक्र से नवाज़ा गया.
दिल्ली विश्व विद्यालय के पूर्व विभागाध्यक्ष कमलेश शुक्ला के मुताबिक
अंग्रेजी हुकूमत में बनी भारतीय सेना में वीर अब्दुल हमीद १८५७ की विद्रोही भारतीय परम्परा के वाहक थे. 1857 की परम्परा में गाजीपुर के रणबांकुरे सिपाहियों का योगदान भुलाया नहीं जा सकता. १८५७ के युद्ध में बेग़म हज़रत महल के तोपची गाजीपुर के गहमरी मुसलमान लड़ाके होते थे. गाजीपुर के गाँव गहमर के सिपाहियों ने १८५७ से १९४२ तक संघर्ष जारी रखा. इसी का परिणाम रहा कि हिन्दुस्तान की आज़ादी की लड़ाई में गाजीपुर देश के बाकी हिस्सों से पहले आजाद हुआ. आज गहमर गाँव देश का सबसे बड़ा गाँव होने के साथ साथ देश के सबसे शिक्षित गाँव के तौर पर भी जाना जाता है.
देश के लिए जान देने वाले वीरों की स्मृति के भावावेश वर्तमान को देखते हुए अनायास ही मुंह से निकल जाता है.....
देखो वीर जवानों अपने खून पे इल्जाम न आये
माँ न कहे कि मेरे बेटे वक़्त पड़ा तो काम न आये.