हाई कोर्ट इंदौर,मध्यप्रदेश: पत्रकार की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचला नहीं जा सकता

23 सितम्बर- 6.25PM
मेधज न्यूज़ : भ्रष्टाचार के मामलों में लगातार समाचार प्रकाशित करने वाले पत्रकार के विरुद्ध जिला प्रशासन द्वारा की गई रासुका की कार्रवाई को हाईकोर्ट इंदौर खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में न केवल खारिज कर दिया, बल्कि राज्य शासन पर 10 हजार रुपए हर्जाना भी लगाया है। यह राशि पीड़ित पत्रकार को 30 दिन के अंदर देने के आदेश दिए गए हैं।

कोर्ट ने माना है पत्रकार की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचला नहीं जा सकता। जस्टिस एससी शर्मा की बेंच ने पत्रकार अनूप पिता टीएन सक्सेना निवासी 12, पटेल मार्ग, जिला राजगढ़ की ओर से एडवोकेट अभिषेक तुगनावत द्वारा दायर याचिका में उक्त निर्णय सुनाया।

सक्सेना के विरुद्ध 4 अप्रैल 2014 को तत्कालीन कलेक्टर एमबी ओझा ने मप्र राज्य सुरक्षा अधिनियम के तहत रासुका की कार्रवाई की थी। इस आदेश के विरुद्ध भोपाल के संभागायुक्त के समक्ष की गई अपील भी 21 जुलाई 14 को खारिज कर दी गई। इसके बाद हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ में याचिका दायर की गई।

याचिका में कहा गया जिन दो प्रकरणों के आधार पर उनके विरुद्ध रासुका की गई, इसमें वे दोषमुक्त हो चुके हैं। इसके बावजूद उन पर केवल इसलिए तत्कालीन कलेक्टर ओझा के दवाब में कार्रवाई की गई, क्योंकि वे पत्रकार हैं और शासन-प्रशासन के भ्रष्टाचार के मामलों को लगातार समाचारों के माध्यम से उजागर करते रहे हैं। तर्क सुनने के बाद कोर्ट ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट के पत्रकारों के उत्पीड़न के अनेक न्यायिक दृष्टांतों का हवाला देते हुए इस प्रशासनिक कार्रवाई को नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन माना। कोर्ट ने यह कहते हुए रासुका के उक्त आदेश को खारिज कर दिया कि पत्रकार की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचला नहीं जा सकता।

साथ ही कार्रवाई को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19-1 का उल्लंघन मानते हुए राज्य शासन पर 10 हजार रुपए का हर्जाना भी लगाया है। कोर्ट ने यह भी माना गवाहों के बयानों को याचिकाकर्ता को नहीं दिया गया। उन पर रासुका की कार्रवाई इसलिए की गई, क्योंकि वे जिला प्रशासन के दवाब के आगे बिना झुके भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष जारी रखते रहे। इस कारण तामसिक रवैये से याचिकाकर्ता को दबाने का काम रासुका की कार्रवाई द्वारा किया गया।

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