अगला “सरकारी शार्टकट” बनेंगे 3.5 करोड़ मनरेगा मजदूरों के खाते.

13-9-2014 4.15AM IST

Medhaj News: सरकार की महत्वकांक्षी जन धन योजना का नतीजा निकला कि देश में लाखों लोगों को बैंक खाते मयस्सर हुए. बताया जा रहा है कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने “जन धन योजना” के तहत सरकारी खजाना भरने का नया तरीका खोज निकाला है. जन धन योजना से उत्साहित सरकार उसके अगले चरण में मनरेगा मजदूरों को भी फाइनेंशियल इन्क्लूजन प्रोग्राम के तहत योजना मे लाने के लिए तत्पर है.



जिसके तहत जन धन योजना के अगले चरण में मनरेगा मजदूरों के 4.4 करोड़ मजदूरों के खाते खोलने का लक्ष्य तय किया गया है. गौर तलब है कि रोजगार गारंटी योजना के तहत बैंक या पोस्ट ऑफिस में कुल 9.98 करोड़ एकाउंट्स है। इनमें 3.66 एकाउंट्स पोस्ट ऑफिसों में हैं, और 0.75 करोड़ को-ऑपरेटिव में। जाहिर है कि बाकी लोगों का पैसा बैंकों में जमा करवाने के लिए सरकार प्रतिबद्ध है.

शहरी एवं सामुदायिक विकास में डीएफआईडी के कंसल्टेंट रहे डॉक्टर ओंकार मित्तल का मानना है कि शहरों को चमकाने के लिए चल रहे इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र के दैत्याकार प्रोजेक्टों के लिए जन धन योजना की कुल पूंजी भी ऊँट के मुह में जीरा जैसी है. ठोस योजनाओं के आभाव में सरकारी बजट योजना की गुणवत्ता के बजाये खर्च करने पर केन्द्रित होता है. इस परम्परा में डाकघरों और मनरेगा मजदूरों के खाते भी जोड़ दिए जाएँ तो भी खर्च पूरा नहीं पड़ने वाला. ऐसे में सरकार की अभिलाषाएं पूरी होंगी भी या नहीं ये संदेह का विषय है. दर्जनों विभागों के खर्चे दिखा के खजाना खाली बता देना बहुत सरल है.

वैश्विक पूंजी के प्रमुख अर्थशास्त्री राकेश रफीक़ के अनुसार “सरकार के पास दो रास्ते हैं एक विदेशी निवेश या विनिवेश अथवा विश्व बैंक से कर्जे लेना और दूसरा आवाम की बचत से सरकारी योजनाओं का पोषण करना. जन धन योजना से यह प्रतीत होता है कि सरकार आवाम की बचत को सरकारी खर्चे का जरिया बनाना चाहती है. इसी सिलसिले में सरकार जन धन जुटाने के लिए नए नए “शार्टकट्स” तलाश रही है. सरकार बताये तो कि जन धन योजना के पहले चरण में जुटाए जनता की गाढ़ी कमाई के 1500 करोड़ रुपये से कितनी कंपनियों के प्रोजेक्ट चलेंगे”?

जाहिर है कि यदि सरकार की मंशा कर्जे की व्यवस्था आगे न बढ़ा के खुद मुख्तारी का हौसला रखती है तो कुछ ठोस योजनायें तय करे ताकि जनता के खून पसीने की कमाई से कुछ सार्थक परिणाम निकलें.