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क्या-क्या चाहे ये मन?

Medhaj News 25 Jul 19,17:14:44 Special Story
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जाना चाहे ये मन, उन बादलों के पार;

जहाँ न हो जिम्मेदारियाँ, और न हों बंधनों की दीवार।


उड़ना चाहे ये मन, उन पंछियों की तरह;

जो घूम लेते हैं पूरी दुनिया, फ़िर भी नहीं होते हैं गुमराह।

बहना चाहे ये मन, जैसे उस नदिया की धार;

जिसके प्रवाह को रोकने की, सारी कोशिशें हो जाती हैं बेकार।


बसना चाहे ये मन, उन चाँद-तारों के बीच;

जिनकी बस देने की है आदत, न है लेने की कोई रीत।

बजना चाहे ये मन, उस संगीत की तरह;

जो कर्णों में गुंजित हों, भौंरों के गीत की तरह।


खिलना चाहे ये मन, उन सुन्दर पुष्पों की भाँति;

जिसकी महक से मिलता है सुकून और नेत्रों को असीम शांति।

रंगना चाहे ये मन, इन्द्रधनुष के रंगो की तरह;

ताकि जहाँ तक उठे ये निगाहें, चहुँ ओर बस प्रेम-रंग हो बिखरा।


बरसना चाहे ये मन, सावन के बरखा के समान;

जिसे देख के लगे, जैसे झूम रहा हो सारा आसमान।

गढ़ना चाहे ये मन, कोई कहानी कभी-कभी;

जिसमें शब्दों में फ़िर जी सकें, जिन्दगानी कभी-कभी।


छोड़ना चाहे ये मन, निशानी कभी कोई;

कि न भुला सके लोग ये कहकर कि 'हाँ थी एक कोई'।




(भावना मौर्य)


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