पितृपक्ष:आज से शुरू , जानिए क्यों किया जाता है श्राद्ध?

Medhaj news 25 Sep 18,16:08:03 Lifestyle
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25 सितंबर से पितृ पक्ष शुरू हो चुके हैं और यह 8 अक्टूबर 2018 तक चलेगा। इन 15 दिनों में मृत्यु लोक से पितर धरती पर अवतरित होंगे और अपने परिजनों को आशीर्वाद प्रदान करेंगे। इन दिनों परिजन भी उनका विधि-विधान से तर्पण करते हैं। श्राद्ध के बारे में धर्म ग्रन्थों में अनेक बाते बताई गई हैं। सबसे पहले श्राद्ध के बारे में भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को बताई थी। महाभारत के अनुशासन पर्व में श्राद्ध की परंपरा कैसे आरम्भ हुई और जनमानस तक पहुंचने के बारे में विस्तार से बताया गया। बहुत ही कम लोग ही जानते होंगे दुनिया में सबसे पहले श्राद्ध किसने किया था। आइए जानते हैं श्राद्ध का महत्व।

हिन्‍दू धर्म में पितृ पक्ष का विशेष महत्‍व है |हिन्‍दू धर्म को मानने वाले लोगों में मृत्‍यु के बाद मृत व्‍यक्ति का श्राद्ध करना बेहद जरूरी होता है |मान्‍यता है कि अगर श्राद्ध न किया जाए तो मरने वाले व्‍यक्ति की आत्‍मा को मुक्ति नहीं मिलती है |वहीं कहा जाता है कि पितृ पक्ष के दौरान पितरों का श्राद्ध करने से वे प्रसन्‍न होते हैं और उनकी आत्‍मा को शांति मिलती है |मान्‍यता है कि पितृ पक्ष में यमराज पितरों को अपने परिजनों से मिलने के लिए मुक्‍त कर देते हैं |इस दौरान अगर पितरों का श्राद्ध न किया जाए तो उनकी आत्‍मा दुखी हो जाती है |

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महाभारत के अनुशासन पर्व के अनुसार, सबसे पहले श्राद्ध का उपदेश अत्रि मुनि ने दिया था। इसके बाद सबसे पहले श्राद्ध महर्षि निमि ने किया था। बाद में धीरे-धीरे कई अन्य महर्षि भी श्राद्ध करने लगे और पितरों को अन्न का भोग लगाने लगे। जैसे-जैसे श्राद्ध की परंपरा बढ़ती गई देवता और पितर धीरे-धीरे पूर्ण रूप से तृप्त हो गए। जिसके बाद उन्हें भोजन को पचाने की समस्या सामने आने लगी।लगातार श्राद्ध का भोजन करने से पितरों को भोजन का न पचना रोग हो गया था।  तब पितर और देवता सभी अपनी परेशानी को लेकर ब्रह्राजी के पास उपाय मांगने गए। तब ब्रह्राजी ने देवताओं और पितरों की बातें सुनकर कहा कि आपकी समस्या का समाधान अग्निदेव करेंगे।

देवताओं और पितरों की समस्या को सुनकर अग्नि देव ने कहा अब से श्राद्ध में हम सभी एक साथ भोजन ग्रहण करेंगे। मेरे साथ भोजन करने पर भोजन के पचाने की समस्या दूर हो जाएगी। इसके बाद से ही सबसे पहले श्राद्ध का भोजन अग्नि को फिर बाद में पितरों का दिया जाता है। ग्रंथों के अनुसार, श्राद्ध में अग्नि देव के उपस्थित होने पर राक्षस वहां से दूर भाग जाते हैं। हवन करने के बाद सबसे पहले निमित्त पिंडदान करना चाहिए। सबसे पहले पिता को, उसके बाद दादा को फिर परदादा को तर्पण करना चाहिए। अमावस्या की तिथि पर श्राद्ध जरूर करना चाहिए।

पितृपक्ष में किए जाने वाले श्राद्ध में तिल और कुश की महत्ता इस मंत्र के द्वारा बताई गई है। जिसमें भगवान विष्णु कहते हैं कि तिल मेरे पसीने से और कुश मेरे शरीर के रोम से उत्पन्न हुए हैं। कुश का मूल ब्रह्मा, मध्य विष्णु और अग्रभाग शिव का जानना चाहिए। ये देव कुश में प्रतिष्ठित माने गए हैं। ब्राह्मण, मंत्र, कुश, अग्नि और तुलसी ये कभी बासी नहीं होते, इनका पूजा में बार-बार प्रयोग किया जा सकता है।

 

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